वक़्त की कमी कहें, लैपटॉप का न होना, माहौल का बदलना, या फिर मेरी काहिली – पर एक-डेढ़ साल में पहली बार ऐसा हुआ कि तीन महीनों तक कोई भी कविता न निकली. स्थिति यहाँ तक आ गयी थी कि मेरे अन्दर का जो थोड़ा बहुत कुछ कवि था, वो मरने वाला है, ऐसा लगने लगा था. 

ग़ज़ल लिखने का ये मेरा विनम्र प्रयास है. हैदराबाद शहर की फिजा, और ग़ज़ल लिखने का हुनर, शायद दोनों के बारे में ही मैं कुछ नहीं जानता. लेकिन फिर भी इसे यहाँ पेश कर रहा हूँ, क्योंकि कारपोरेट दुनिया कवि को अभी तक तो नहीं मार पायी है, ऐसा संबल देने का अहसान तो इस ग़ज़ल का मुझ पर है ही.

हैदराबाद

वक़्त की मार कर देती है निजामों को भिखमंगा,
ये गन्दा नाला भी कभी मूसी कहलाता था.

रईस बड़े बनते हो, लम्बी कार खरीदकर
निज़ाम जैकब हीरे से मन बहलाता था.

शहर की फिजा बदल दी, ए सी के झोंकों ने
कभी यहाँ आदमी, आदमी को सहलाता था.

अजान पर हाथ जोड़ता पंडित
मौलवी शिवलिंग को नहलाता था.

शान – ए – निजाम कहलाता था
नग़मा – ए – दक़्न कहलाता था
जिसे आज पुराना कहते हो, कभी हैदराबाद कहलाता था.