बड़े दिन हो गए कुछ पोस्ट किये हुए. टूटी हुई टांग लेकर जब बैठा, तभी आई आई एम आने के बाद पहली बार अपनी पुरानी कविताओं पर नज़र मारी. नया तो आजकल कुछ लिखा जाता नहीं. इतना कुछ बदल गया ज़िन्दगी में – सोचा कि बचपन से आज तक जो एक चीज़ नहीं बदली, उसी पर कुछ पोस्ट किया जाए.
नए दोस्तों को भी पसंद आएँगी, ऐसी उम्मीद कर रहा हूँ… नहीं तो मेरा कुछ वक़्त तो कट ही गया
अरावली
पानी बरसा,
और जाने कब की प्यासी धरती ने,
ज़रा प्यास बुझते ही
इत्र छिड़क लिया.
तन को ढांपने की नाकाम कोशिश कर रही
अरावली ने भी
झूमकर
अपनी चिथड़ी हुई साड़ी लहरा दी.
कौन कहता है कि जश्न मनाने का हक़
गरीबों को नहीं होता.
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अरावली कोई प्रेमिका नही है
जिसकी घनी जुल्फों में खोकर
उसके यौवन का आनंद लिया हो मैंने.
वह तो वो दरिद्र, बूढी माँ है
जिसकी झुर्रीदार बाँ और फटे आँचल
में खेलकर
बीता है मेरा बचपन.
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शहर में बड़ा शोर है,
और यह शहर बड़ा सभ्य है.
जी करता है आज फिर
उन्हीं सूखी, कंटीली, पथरीली
लू के थपेडों में
अकेली, बेलौस झूम रही
वादिओं से जाकर पूछ लूं,
कि कहो, कैसी हो…
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Vox Populi