किसी भी कविता को देखने के दो तरीके हो सकते हैं. पहला तो ये कि कविता को कवि से अलग रख कर सिर्फ एक रचना के रूप में देखा जाए और कविता को पढ़ कर कवि की निजी ज़िन्दगी या उसके अनुभवों पर कोई नतीजा न निकाला जाए.
कविता पढ़ने का मेरी नज़र में यह कुछ प्रौढ़ तरीका है. लेकिन इंसान, इंसान है और जहां पर इंसानों की बात होती है, वहां पर कुछ भी इतना काला-सफ़ेद नहीं होता. कविता आखिर भावनाओं से ही निकलती है, और जहां तक मैं समझता हूँ, कविता पढ़ कर पढ़ने वाला कवि के व्यक्तित्व के बारे में कुछ न कुछ इम्प्रेशन ज़रूर बनाता है.
यह कविता यहाँ डाल रहा हूँ. भावनात्मक रूप से इस कविता से जुड़ा हुआ था, इसलिए अब तक पोस्ट नहीं की थी. वो भावनाएं अब प्रायः महत्त्व नहीं रखतीं, और यह कविता अब सिर्फ एक रचना है. इसे मैंने लिखा है, इसके अलावा अब इसमें मेरा निजी कुछ भी शेष नहीं है.
आओ बैठो
आओ बैठो
कि मिलकर टहलेंगे
शेक्सपियर की दुनिया में
मेरी गोद में सर रखे तुम
डूब जाओ
जूलियट की जुल्फों की खुशबू के
मदहोश नशे में
पीछे एरिक क्लैप्टन गाता रहे
‘डार्लिंग यु आर वंडरफुल टुनाइट’
पृष्ठभूमि में
मंद मंद
या फिर
उड़ चलें हम
हवा के घोड़े पर होकर सवार
कहीं अनंत आसमान की सैर करने
आगे आगे चलती तुम
और पीछे बैठा मैं
चख लिया करूँ, बात बात पर
उस सुराही में से
जिसे तुम अपनी गरदन कहती हो
या फिर कभी
यूं ही समा जाओ बाँहों में
और यह नरम अहसास
मेरा है
यह महसूस करते हुए,
सीने में से पिघल कर बहती हुई
कब की एक भयानक हूक
में तुम्हे नहलाते हुए
फुसफुसा कर तुम्हारे कान में कह दूँ
कि कितना इंतज़ार किया है
हर एक इस पल का मैंने…
