Daily Archives: August 31, 2007

शहर में

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शहर में

शहर में
बम फ़टता है,
धमाकों का
कहर टूटता है।
कुछ लोग
मरते हैं,
कई घायल होते हें।
अगले दिन
अस्पताल के चक्कर लगते हैं,
लोग एक् दूजे के लिये
प्रार्थना सभा करते हैं,
विरोध प्रदर्शन होते हैं,
दंगे भडक जाते हैं,
सब कुछ शांत होने तक।

फ़िर एक दिन
शहर में
बम फ़टता है,
धमाकों का
कहर टूटता है।
कुछ लोग
मरते हैं,
कई घायल होते हें।
अस्पताल के चक्कर फ़िर लगते हैं,
अखबारों में खबर
फ़िर बनती है,
मगर प्रार्थनाएं नहीं होतीं,
दंगे नहीं भडकते,
दो दिन में शहर शान्त हो जाता है।

फिर फिर एक् डिन्
शहर में
बम फ़टता है।
धमाकों का
कहर टूटता है।
कई लोग
मरते हैं,
कई कई घायल होते हैं।
देखने वाले चलते रहते हैं।
एक गाडी आती है,
लाशें उठा लेती है।
खून के धब्बों को गाडियां रौंद देती हैं।
सब कुछ शांत रहता है।

शायद सब कुछ शून्य हो चुका है।

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Categories: Poems | 12 Comments

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