शहर में(2)

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यह कविता पुरानी है। लोगों ने विचार की सराहना की, परन्तु कमियाँ भी गिनाईं थीं। बाद में लिटरेरी क्लब में लाल्टू सर ने दुबारा लिखने, और जीवन-पर्यंत पढ़ते रहने पर सुधार करने की सलाह दी। मुझे भी लगा, बात में यथार्थ है।
आइंदा बिना 3-4 सुधार किये कविता को इन पेजेस पर डालने की भूल नहीं करूंगा। आशा करता हूं, इस बार यह कविता अच्छी लगेगी।

शहर में

शहर में
बम फटता है।
धमाकों का
कहर टूटता है।
कुछ लोग मरते हैं,
कई घायल होते हैं।
हर कान स्तब्ध,
हर दिमाग
बन्द हो जाते हैं।
कांपते हाथों को लाशें ढोते,
फटी आंखें देखती हैं।
मंदिरों की घंटियां चुप रहती हैं,
मस्जिद में कब्रिस्तां की सी वीरानी पसर जाती है।
खून के धब्बे आँसुओं से पुँछते हैं।
सब कुछ बहुत शांत हो जाता है।

फिर एक दिन
शहर में
बम फटता है।
धमाकों का
कहर टूटता है।
कुछ लोग मरते हैं,
कई घायल होते हैं।
आँखों में केसरिया
डोरे खिंच जाते हैं।
कहीं विरोध-प्रदर्शन,
कहीं दंगे भड़क जाते हैं।
लाशें उठा रही भुजाएं
फड़क रही होती हैं।
मस्जिदों की अज़ान गूंजती है,
तो घंटिओं की टंकार भी
आसमान छूती है।
खून के धब्बों से तिलक होते हैं।
सब कुछ शांत होने तक।

फिर फिर एक दिन
शहर में
बम फटता है।
धमाकों का
कहर टूटता है।
कुछ लोग मरते हैं,
कई घायल होते हैं।
सुन्न हुये कान
धमाके सुन नहीं पाते।
आँखों पर काले चश्मे
चढ़े ही रहते हैं।
अंधी अज़ान कुछ नहीं देखती,
बहरी घंटियां भी
अनवरत बजती ही रहती हैं।
खून के धब्बों को गाड़ियों के पहिये रौंद देते हैं।
सब कुछ शांत रहता है।

शायद सब कुछ शून्य हो चुका है।

Categories: Poems | 5 Comments

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5 thoughts on “शहर में(2)

  1. anindita

    a very good attempt i appreciate d fact dat u made an attempt to write in hindi n quite a successful one at dat too especially in todays time where i won a bet from this friend of mine who dint know dat it was our national language!!!!!! believe dat?????can very well feel wat u have conveyed coz have felt n witnessed dat happenin a bit tooo often hope some one read ur poem n realise hope these words wudnt fall on deaf ears again…..

  2. Hi,
    Its really a good piece of creativity!!
    You raised a very good issue of “Sleep Walking through Life”. Specially the last paragraph talks about it very well.
    These attempts are neccesary to wake up people like us from the deep sleep we are in.
    Thanks,

  3. A very realistic poem especially the last stanza its for all of us who ignore such incidents as aptly described by u ham sab ek kala chashma pehen lete hain …

  4. Thanks guys, really appreciate all this positive feedback. A lot more is on its way. Keep dropping by.

  5. I specially like the use of d wrd “shanti” , the kind of “shanti” we dunno want….
    The sarcasm is really good. keep writin on such sensitive stuff….🙂, we really need to wake up.

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