Monthly Archives: January 2009

सड़क पर

सड़क पर

सुबह के धुंधलके में
नए शहर की इस नई सड़क पर
मैं दौड़ रहा हूँ.

चिकनी, कठोर सड़क
की कठोरता
समा रही है पैर में
हर पदचाप के साथ.
थप – थप
सड़क पीट रही है पाँव को.
पेशियाँ कस रही हैं
पैर की हड्डियाँ
टीस – टीस जा रही हैं.
इतनी कठोरता के आदी
मेरे पैर तो नहीं
यह सड़क शायद
मशीनों के लिए ही बनाई गई है.

सड़क के हाशिये
पर पड़ी है कुछ मिट्टी.
एक झीना परदा
जो कठोरता को कम नहीं करता
बल्कि जिसकी फिसलनी सतह
उम्मीदें तोड़ सकती है
उन धावकों की
जिनके पैर
कुछ नरमी की आस में
उसकी तरफ़ मुड़ जाते हैं.

सड़क की पूरी लम्बाई
और पूरी चौड़ाई
ढकी  है एक कठोर,
सभ्य, एकसार आवरण से.
धरती की मुलायम, अल्हड़ ऊँच – नीच
पर अब तक चले मेरे पैर
यहाँ दर्द करते हैं
पर मैं रुक नहीं सकता:
क्योंकि रुकते ही मुझे कुचल देंगे
मेरे पीछे आ रहे वे मज़बूतपाँव
जो हर पल
मुझसे आगे निकलने को बेकरार हैं.

Advertisements
Categories: Poems | 6 Comments

Blog at WordPress.com.