निशानची

पिछली कुछ पोस्ट्स से एक बड़ा अजीब सा ट्रेंड आ गया है इस ब्लॉग पर. बड़े और घमंडी नेता जिस तरह सभा को भाषण पिला कर बिना किसी से कुछ कहे सुने हवाई जहाज़ में उड़ जाते हैं, कुछ कुछ वैसे ही मैं भी यहाँ कविता बस मार दे रहा हूँ. आप लोगों से सीधा संवाद हो ही नहीं पा रहा है. साथ ही गद्य लिखे हुए अरसा हो गया है. इसे रचनात्मकता को पुनर्जीवित करने के लिए लिया गया एक ‘क्रिएटिव ब्रेक’ कहने की लंगडी कोशिश मैं कितनी ही कर लूँ, सचाई यही है की इन दिनों इस संवादशून्यता के पीछे मेरा आलस ही जिम्मेदार है, और कुछ नहीं.

चलिए इसी गिले शिकवे के बहाने कुछ सीधी बात ही हो गई. ये कविता पिछले दिनों लिखी थी. बताइए कैसी लगी. और एक अगली पोस्ट जल्दी ही लिखूंगा.

कुछ और नहीं, तो आप लोगों से किया गया ये वादा मुझे आलस छोड़ने की याद ही दिलाता रहेगा!

निशानची

निशानची
बन्दूक उठाता है
निशाना लगाता है
हर उस चीज़ पर
जिस पर निशाना लगाने की
कीमत मिल रही हो.

न उसकी आँख फड़कती है
न उंगली कांपती है.
जीवित – मृत , जड़-  चेतन
गर्भवती- जर्जर, दोषी – निर्दोष
देखता है हर लक्ष्य को बन्दूक की नाल के परे
और दबा देता है घोड़ा.

फिर संभालता है अपने पैसे,
जाकर कहीं तर करता है गला,
देखता है नाच- गाना
और सो जाता है,
सुबह उठकर फ़िर से निशाना लगाने के लिए.

अच्छा पैसा,
काम में महारथ,
आराम की ज़िन्दगी.

सब कहते हैं कि वह खुश है
पर पी कर कई बार वह मुझसे कह चुका है
कि यार, ऐसा क्यूँ नहीं होता
कि किसी के घावों पर मरहम लगा कर
उसे सीने से लगा लेने
के भी अच्छे पैसे मिल जाते.

Categories: Poems | 3 Comments

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3 thoughts on “निशानची

  1. strangersingh

    marham lagane ki achi kimat zaroor milti hai……..aur agar hum wo na maangte huye marham lagaye to uttam hai……i mean selfless service…..[:)]
    btw nice poem……nishaanchi ke paas bhi ek dil hota hai….

  2. strangersingh

    my smiley in brackets indicates orkut fever😀

  3. Nice post!
    Depicting the reality in nice way.
    Complete market is based on “invisible robbery” (not visible directly through eyes). More proficient in robbery one is, higher one get paid. Those who are less proficient are finding it unable to survive in the market on “invisible robbery” and thus they are bending towards “Visible Robbery” and then we call that as crime.
    Unfortunately, problem is somewhere else where we feel it is.

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