Monthly Archives: September 2009

आओ बैठो

किसी भी कविता को देखने के दो तरीके हो सकते हैं. पहला तो ये कि कविता को कवि से अलग रख कर सिर्फ एक रचना के रूप में देखा जाए और कविता को पढ़ कर कवि की निजी ज़िन्दगी या उसके अनुभवों पर कोई नतीजा न निकाला जाए.

कविता पढ़ने का मेरी नज़र में यह कुछ प्रौढ़ तरीका है. लेकिन इंसान, इंसान है और जहां पर इंसानों की बात होती है, वहां पर कुछ भी इतना काला-सफ़ेद नहीं होता. कविता आखिर भावनाओं से ही निकलती है, और जहां तक मैं समझता हूँ, कविता पढ़ कर पढ़ने वाला कवि के व्यक्तित्व के बारे में कुछ न कुछ इम्प्रेशन ज़रूर बनाता है.  

यह कविता यहाँ डाल रहा हूँ. भावनात्मक रूप से इस कविता से जुड़ा हुआ था, इसलिए अब तक पोस्ट नहीं की थी. वो भावनाएं अब प्रायः महत्त्व नहीं रखतीं, और यह कविता अब सिर्फ एक रचना है. इसे मैंने लिखा है, इसके अलावा  अब इसमें मेरा निजी कुछ भी शेष नहीं है.

आओ बैठो
आओ बैठो
कि मिलकर टहलेंगे
शेक्सपियर की दुनिया में
मेरी गोद में सर रखे तुम
डूब जाओ
जूलियट की जुल्फों की खुशबू के
मदहोश नशे में
पीछे एरिक क्लैप्टन गाता रहे
‘डार्लिंग यु आर वंडरफुल टुनाइट’
पृष्ठभूमि में
मंद मंद

या फिर
उड़ चलें हम
हवा के घोड़े पर होकर सवार
कहीं अनंत आसमान की सैर करने
आगे आगे चलती तुम
और पीछे बैठा मैं
चख लिया करूँ, बात बात पर
उस सुराही में से
जिसे तुम अपनी गरदन कहती हो

या फिर कभी
यूं ही समा जाओ बाँहों में
और यह नरम अहसास
मेरा है
यह महसूस करते हुए,
सीने में से पिघल कर बहती हुई
कब की एक भयानक हूक
में तुम्हे नहलाते हुए
फुसफुसा कर तुम्हारे कान में कह दूँ
कि कितना इंतज़ार किया है
हर एक इस पल का मैंने…

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हैदराबाद

वक़्त की कमी कहें, लैपटॉप का न होना, माहौल का बदलना, या फिर मेरी काहिली – पर एक-डेढ़ साल में पहली बार ऐसा हुआ कि तीन महीनों तक कोई भी कविता न निकली. स्थिति यहाँ तक आ गयी थी कि मेरे अन्दर का जो थोड़ा बहुत कुछ कवि था, वो मरने वाला है, ऐसा लगने लगा था. 

ग़ज़ल लिखने का ये मेरा विनम्र प्रयास है. हैदराबाद शहर की फिजा, और ग़ज़ल लिखने का हुनर, शायद दोनों के बारे में ही मैं कुछ नहीं जानता. लेकिन फिर भी इसे यहाँ पेश कर रहा हूँ, क्योंकि कारपोरेट दुनिया कवि को अभी तक तो नहीं मार पायी है, ऐसा संबल देने का अहसान तो इस ग़ज़ल का मुझ पर है ही.

हैदराबाद

वक़्त की मार कर देती है निजामों को भिखमंगा,
ये गन्दा नाला भी कभी मूसी कहलाता था.

रईस बड़े बनते हो, लम्बी कार खरीदकर
निज़ाम जैकब हीरे से मन बहलाता था.

शहर की फिजा बदल दी, ए सी के झोंकों ने
कभी यहाँ आदमी, आदमी को सहलाता था.

अजान पर हाथ जोड़ता पंडित
मौलवी शिवलिंग को नहलाता था.

शान – ए – निजाम कहलाता था
नग़मा – ए – दक़्न कहलाता था
जिसे आज पुराना कहते हो, कभी हैदराबाद कहलाता था.

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Fishing

(Vivek and Aish are chatting.) 

Vivek: Hey Aish, I hope you didn’t mind what I said last night. I wasn’t totally in my senses, you know.

Aish: It’s alright vivek. I don’t think that much.

Vivek: thanks Aish. You’re a honey.

(A few minutes pass)

 

Vivek: Hey Aish, you don’t think too much na. Good.

Vivek: You were looking positively beautiful yesterday.

Aish: Hehe Thank you thank you.

 

(Next day they meet each other in a Store)

 

Vivek: Hey Aish! Surprise! Wassup lady!

Aish: Hey Vivek! Hi. You know what!

Vivek: What?

Aish: I don’t think too much.

Categories: Humor, Short Stories | 9 Comments

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