दो कवितायें

इस वर्ष की शुरुआत हुई थी दो कविताओं के वागर्थ के जनवरी अंक में प्रकाशन से. ब्लॉग पर डाला ही नहीं, न कुछ एक दोस्तों, जिनसे कि रोज़ बात हो रही थी, को छोड़कर किसी को बताया. न जाने क्यों बताने की ज़रुरत ही महसूस नहीं हुई.

अभी ट्रिपल आई टी ब्लॉग जगत के लम्बे समय के साथी कुनाल की कहानियाँ प्रकाशित होने वाली हैं. कुनाल को ढेर सारी बधाइयाँ! आपकी किताब प्रकाशित होने का इंतज़ार रहेगा. जो अभी प्रकाशित हो रही है उसका, और जो आगे प्रकाशित होंगी, उनका भी.

कवितायें बहरहाल यहाँ.

बाँझ

इतिहास के सूखे कुँए में
वीरता का एक खँडहर है
जिसके परकोटे से झांकता,
पान मसाला चबाता हुआ एक युवक
दूर कहीं एक गगनचुम्बी इमारत
की सबसे ऊपरी ही मंजिल
को देख पाता है,
ठहाका लगाता है
और मूंछ मरोड़ मरोड़ कर
कमर तक घूंघट किये बैठी
अपनी औरत को
अपने परदादा की
अँगरेज़ बहादुर से दोस्ती के किस्से सुनाता है .

दूर उस इमारत की
हरे कांच की दीवारों
के पीछे बैठा मैं
एस्प्रेसो की ठंडी चुस्कियां लेता हुआ
एक गर्व भरी मुस्कान के साथ
उसे देखता रहता हूँ,
और फिर टाई की नॉट सीधी करके
घुस जाता हूँ अपने कंप्यूटर में
किसी और गोरे की चाकरी करने.

हम दोनों के बीच में जो धरती है,
साली वह आज तक बाँझ है
क्योंकि हमारी जैसी औलादें पैदा की हैं उसने.

__________________________

मेरे साथ

लोग बैठे हैं दुकानों पर
कि बढ़ाते समय
भारी से भारी गल्ला साथ ले जाएँ.

लोग बैठे हैं दफ्तरों में
कि महीने के आखिर में
मोटे से मोटा चेक साथ ले जाएँ.

लोग बैठे हैं पढाई करने
कि कॉलेज छोड़ते समय
ऊंचे से ऊंचे ग्रेड साथ ले जाएँ.

मैं भी हूँ बैठा, भादों की इस रात में,
जंगल में तालाब के किनारे.
मेंढकों की टर – टर,
झींगुरों की झाँये – झाँये,
या इस काली सतह पर
दूर तक फैली नीरवता
का ही शायद कोई टुकडा
चला आये मेरे साथ भी.

(वागर्थ, जनवरी २०१०)

लाल्टू सर और उनके हिंदी कोर्स के बिना शायद मैं तो कवितायें लिखना और छपवाना तो दूर, पढ़ना भी शुरू नहीं करता. यह अतिशयोक्ति बिलकुल नहीं है कि जो कुछ कवि मैं हूँ/ रहा हूँ, वह उन्हीं की वजह से. शब्द छोटे हैं, पर फिर भी कहूँगा कि थैंक्स, सर.

Categories: Poems | 7 Comments

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7 thoughts on “दो कवितायें

  1. SHALINI MOOKIM (KOTHARI)

    Shayad tunhe yaad hoga, mein Ajmer mein aapki colony mein rehti thi.. aapki kavitaein padhi.. laga ki aapne sirf likhne ko nahi balki mahsoos kakrke apne ird gird ke ahsaas likhe hein..
    hardik badhaiyaan..

  2. शालिनी दीदी,
    मुझे आपकी बखूबी याद है. आखिरकार आप लोगों के बारे में सुन सुन कर ही हमें लगता था कि बड़े होकर इनकी तरह बनना है.
    अगर आपको याद हो तो आपने कुछ किताबें दी थीं कभी. ‘द डे द सीलिंग फेल डाउन’ उनमे से एक थी और मुझे बहुत पसंद आई थी. अजमेर में घर में आज भी रखी है…
    मेरे ब्लॉग पर आप आयीं, बहुत अच्छा लगा. आती रहिये🙂

  3. mujhe pehli kavita bahut pasand aayi🙂

  4. Thanks Aniket🙂

    और तुम्हे भी हार्दिक शुभकामनाये.

    दोनों ही कवितायेँ अति उत्तम हैं, खासकर पहली वाली, पढ़ कर ऐसा लगता हैं कि काम करना छोड़ देना चाहिए🙂

  5. pehle waali kavita kaafi sateek hai!

    Thanks!

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