Monthly Archives: January 2016

मंज़िलें

तुझे सूंघ सकता हूँ
तेरी गंध मदहोश करती है
शीशगंज की इबारत
विश्वनाथ का धुंआ
मोईनुद्दीन की चादर का माथे पर स्पर्श.

मेरे क़रीब है तू
तुझे जीना चाहता हूँ
तुझी में समाना चाहता हूँ
रोमियो या रांझा नहीं हूँ
या टाइटैनिक का जैक डॉसन
तेरे बिना भी जी लूंगा

लेकिन तू  है, पूरी ज़िंदगी
शायद जिसके लिए तैयारी की थी।

सफ़र लम्बा तय किया है
मंज़िलें अक़सर सरक जाती हैं
लेकिन ऐसा क्यों लगता है,
कि घूम फिर कर जहाँ भी जाउंगा,
मंज़िल तुझे ही पाऊँगा,

हम्म?

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खूबसूरत

आँखें मिलीं,
 तो दिल कुछ ठंडा हुआ.
 चल रहे हैं दोनों, एक साथ
 खुद को बनाते, खुद को संवारते
 खुद में जीते, ठोकर खाते
 ठोकर खाने पर देखते, अन देखते
 उठ खड़े होते
 कपड़े झाड़ते
 बढ़ जाते।
 एक पल का जीना
 एक पल का मिलना
 पल, जिसका इंतज़ार था
 पल, जो खूबसूरत था
 पल, जो एक पल भर था.
फिर से देखते एक दूजे को, प्यार से, और बढ़ जाते
 हर उस राह की ओर
 जो मंज़िल को क़रीब ले आती हो.
 नदी के दो तीरे 
 उलट धार चलते हम;
 चलना जीवन है, या मिलना
 या मिलने की आस में, चलते रहना?
कल फिर शोख नयन दो-चार हुए
 तो लगा कि ज़िन्दगी खूबसूरत है.
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