मंज़िलें

तुझे सूंघ सकता हूँ
तेरी गंध मदहोश करती है
शीशगंज की इबारत
विश्वनाथ का धुंआ
मोईनुद्दीन की चादर का माथे पर स्पर्श.

मेरे क़रीब है तू
तुझे जीना चाहता हूँ
तुझी में समाना चाहता हूँ
रोमियो या रांझा नहीं हूँ
या टाइटैनिक का जैक डॉसन
तेरे बिना भी जी लूंगा

लेकिन तू  है, पूरी ज़िंदगी
शायद जिसके लिए तैयारी की थी।

सफ़र लम्बा तय किया है
मंज़िलें अक़सर सरक जाती हैं
लेकिन ऐसा क्यों लगता है,
कि घूम फिर कर जहाँ भी जाउंगा,
मंज़िल तुझे ही पाऊँगा,

हम्म?

Categories: Poems | 1 Comment

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One thought on “मंज़िलें

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