Poems

Long, long ago, there used to be a budding poet…

मंज़िलें

तुझे सूंघ सकता हूँ
तेरी गंध मदहोश करती है
शीशगंज की इबारत
विश्वनाथ का धुंआ
मोईनुद्दीन की चादर का माथे पर स्पर्श.

मेरे क़रीब है तू
तुझे जीना चाहता हूँ
तुझी में समाना चाहता हूँ
रोमियो या रांझा नहीं हूँ
या टाइटैनिक का जैक डॉसन
तेरे बिना भी जी लूंगा

लेकिन तू  है, पूरी ज़िंदगी
शायद जिसके लिए तैयारी की थी।

सफ़र लम्बा तय किया है
मंज़िलें अक़सर सरक जाती हैं
लेकिन ऐसा क्यों लगता है,
कि घूम फिर कर जहाँ भी जाउंगा,
मंज़िल तुझे ही पाऊँगा,

हम्म?

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खूबसूरत

आँखें मिलीं,
 तो दिल कुछ ठंडा हुआ.
 चल रहे हैं दोनों, एक साथ
 खुद को बनाते, खुद को संवारते
 खुद में जीते, ठोकर खाते
 ठोकर खाने पर देखते, अन देखते
 उठ खड़े होते
 कपड़े झाड़ते
 बढ़ जाते।
 एक पल का जीना
 एक पल का मिलना
 पल, जिसका इंतज़ार था
 पल, जो खूबसूरत था
 पल, जो एक पल भर था.
फिर से देखते एक दूजे को, प्यार से, और बढ़ जाते
 हर उस राह की ओर
 जो मंज़िल को क़रीब ले आती हो.
 नदी के दो तीरे 
 उलट धार चलते हम;
 चलना जीवन है, या मिलना
 या मिलने की आस में, चलते रहना?
कल फिर शोख नयन दो-चार हुए
 तो लगा कि ज़िन्दगी खूबसूरत है.
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That Moment

The colour deepens, and the smile widens
and then there is a moment
between smile, and parting of lips
there is a moment
when narrowing eyelids
come together
to close in ecstasy.

That moment, for me,
is a slice of heaven.

Fingers run through hair,
and then there is a moment
between push, and release
there is a moment
when the dark strands
fall down
to frame the perfect full moon
in deepest, darkest of nights.

That moment, for me
is a vision of heaven.

The eyes squeeze further
and the lips squeezer
and then there is a moment
when the rose pink petals
part
there is a moment
between bud and flower
when the tentative guards
open the soft gates
to love, to nectar, to life.

That moment for me
is heaven.

There is a moment
between cup and the lip
there is a moment
between longing and fulfilment
my eyes see the world
and then they see you.

and as the wine, touches my eyes
that moment for me
is you.


images

 

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अरावली

बड़े दिन हो गए कुछ पोस्ट किये हुए. टूटी हुई टांग लेकर जब बैठा, तभी आई आई एम आने के बाद पहली बार अपनी पुरानी कविताओं पर नज़र मारी. नया तो आजकल कुछ लिखा जाता नहीं. इतना कुछ बदल गया ज़िन्दगी में – सोचा कि बचपन से आज तक जो एक चीज़ नहीं बदली, उसी पर कुछ पोस्ट किया जाए.

नए दोस्तों को भी पसंद आएँगी, ऐसी उम्मीद कर रहा हूँ… नहीं तो मेरा कुछ वक़्त तो कट ही गया 🙂

अरावली

पानी बरसा,
और जाने कब की प्यासी धरती ने,
ज़रा प्यास बुझते ही
इत्र छिड़क लिया.
तन को ढांपने की नाकाम कोशिश कर रही
अरावली ने भी
झूमकर
अपनी चिथड़ी हुई साड़ी लहरा दी.

कौन कहता है कि जश्न मनाने का हक़
गरीबों को नहीं होता.

——–x————x ——

अरावली कोई प्रेमिका नही है
जिसकी घनी जुल्फों में खोकर
उसके यौवन का आनंद लिया हो मैंने.
वह तो वो दरिद्र, बूढी माँ है
जिसकी झुर्रीदार बाँ और फटे आँचल
में खेलकर
बीता है मेरा बचपन.

—–x—–x—–

शहर में बड़ा शोर है,
और यह शहर बड़ा सभ्य है.
जी करता है आज फिर
उन्हीं सूखी, कंटीली, पथरीली
लू के थपेडों में
अकेली, मदमस्त झूम रही
वादिओं से जाकर कह दूँ,
कि कहो, कैसी हो…

—–x—–x—–

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दो कवितायें

इस वर्ष की शुरुआत हुई थी दो कविताओं के वागर्थ के जनवरी अंक में प्रकाशन से. ब्लॉग पर डाला ही नहीं, न कुछ एक दोस्तों, जिनसे कि रोज़ बात हो रही थी, को छोड़कर किसी को बताया. न जाने क्यों बताने की ज़रुरत ही महसूस नहीं हुई.

अभी ट्रिपल आई टी ब्लॉग जगत के लम्बे समय के साथी कुनाल की कहानियाँ प्रकाशित होने वाली हैं. कुनाल को ढेर सारी बधाइयाँ! आपकी किताब प्रकाशित होने का इंतज़ार रहेगा. जो अभी प्रकाशित हो रही है उसका, और जो आगे प्रकाशित होंगी, उनका भी.

कवितायें बहरहाल यहाँ.

बाँझ

इतिहास के सूखे कुँए में
वीरता का एक खँडहर है
जिसके परकोटे से झांकता,
पान मसाला चबाता हुआ एक युवक
दूर कहीं एक गगनचुम्बी इमारत
की सबसे ऊपरी ही मंजिल
को देख पाता है,
ठहाका लगाता है
और मूंछ मरोड़ मरोड़ कर
कमर तक घूंघट किये बैठी
अपनी औरत को
अपने परदादा की
अँगरेज़ बहादुर से दोस्ती के किस्से सुनाता है .

दूर उस इमारत की
हरे कांच की दीवारों
के पीछे बैठा मैं
एस्प्रेसो की ठंडी चुस्कियां लेता हुआ
एक गर्व भरी मुस्कान के साथ
उसे देखता रहता हूँ,
और फिर टाई की नॉट सीधी करके
घुस जाता हूँ अपने कंप्यूटर में
किसी और गोरे की चाकरी करने.

हम दोनों के बीच में जो धरती है,
साली वह आज तक बाँझ है
क्योंकि हमारी जैसी औलादें पैदा की हैं उसने.

__________________________

मेरे साथ

लोग बैठे हैं दुकानों पर
कि बढ़ाते समय
भारी से भारी गल्ला साथ ले जाएँ.

लोग बैठे हैं दफ्तरों में
कि महीने के आखिर में
मोटे से मोटा चेक साथ ले जाएँ.

लोग बैठे हैं पढाई करने
कि कॉलेज छोड़ते समय
ऊंचे से ऊंचे ग्रेड साथ ले जाएँ.

मैं भी हूँ बैठा, भादों की इस रात में,
जंगल में तालाब के किनारे.
मेंढकों की टर – टर,
झींगुरों की झाँये – झाँये,
या इस काली सतह पर
दूर तक फैली नीरवता
का ही शायद कोई टुकडा
चला आये मेरे साथ भी.

(वागर्थ, जनवरी २०१०)

लाल्टू सर और उनके हिंदी कोर्स के बिना शायद मैं तो कवितायें लिखना और छपवाना तो दूर, पढ़ना भी शुरू नहीं करता. यह अतिशयोक्ति बिलकुल नहीं है कि जो कुछ कवि मैं हूँ/ रहा हूँ, वह उन्हीं की वजह से. शब्द छोटे हैं, पर फिर भी कहूँगा कि थैंक्स, सर.

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Wish you were here

I’m not that much into writing poetry anymore. But sometimes a few lines here and there leave a strong impact and the sleeping instincts spark to life. Only for a brief moment, though, to get back to their usual state of hibernation.

Deepti posted some beautiful lines, from the street poet in before sunrise, on her buzz.

I want you to know what I think / Don’t want you to guess anymore / You have no idea where I came from / We have no idea where we’re going / Lodged in life / Like branches in a river/ Flowing downstream / Caught in the current / I’ll carry you / You’ll carry me / That’s how it could be / Don’t you know me? / Don’t you know me by now?

The following lines flowed out, almost automatically.

Wish you were here, my cup
of that elixir
which was always brimming
strong as ever
each and every moment
and the moments between moments
which kept me going
both the cause
and the reason
for my going on living.

The connection is lost
and I have nothing to live on
a  dry farmland
nothing to offer
hiding my cracks
under the cover of darkness
afraid of the sun
and of what it will show
one, two three
five hundred, six hundred
or was it seven..?

wish you were here, my rose red
I want to drink again.

Ahh, a lot of romanticism for one post, isn’t it?

Do you think my is poem anywhere near the league of the poet? Drop in your honest responses – Yes, no, maybes. It’ll be interesting to see what you people think. I won’t take offence. Honest.

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A Woman in Love

Writing a poem after a long time. Was inspired by this episode, but not enough to actually put it down on paper. Then Himank’s poem showed the way.

Finally settled in the packed compartment,
my brow was wet from the sun.
“When will the train start”, I thought
impatient to leave the station.

My gaze strayed outside,
pillar to post, door to door
and when it rested on the seat in front
it could wander no more.

For there sat quietly,
talking into the phone
a girl, as beautiful as ever existed
as far as I had known.

My critical mind took her in,
her eyes were pools of dark.
But so too was the complexion,
nothing that would leave a mark.

Her hair was thick and dark,
tied up firmly in a braid.
No city ‘posh spice’ this, my type,
she was a small-town maid.

Slipping over to firm hands,
bangles and bracelets were cute.
figure, well, a wee bit too full
underneath the plain Salwar Suit.

With a ‘What nonsense! What’s so great’
I regarded her as a whole again.
And there she was,
as beautiful as when we began.

‘How the…’ as I stared at her, puzzled,
she smiled, turned red, laughed into the phone
then bit her lip, glanced upward,
caught me looking and talked in a hushed tone.

And seeing her thus, the secret
of her beauty hit me, by Jove
She was so beautiful, for the simple reason
That she was A woman in love!
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आओ बैठो

किसी भी कविता को देखने के दो तरीके हो सकते हैं. पहला तो ये कि कविता को कवि से अलग रख कर सिर्फ एक रचना के रूप में देखा जाए और कविता को पढ़ कर कवि की निजी ज़िन्दगी या उसके अनुभवों पर कोई नतीजा न निकाला जाए.

कविता पढ़ने का मेरी नज़र में यह कुछ प्रौढ़ तरीका है. लेकिन इंसान, इंसान है और जहां पर इंसानों की बात होती है, वहां पर कुछ भी इतना काला-सफ़ेद नहीं होता. कविता आखिर भावनाओं से ही निकलती है, और जहां तक मैं समझता हूँ, कविता पढ़ कर पढ़ने वाला कवि के व्यक्तित्व के बारे में कुछ न कुछ इम्प्रेशन ज़रूर बनाता है.  

यह कविता यहाँ डाल रहा हूँ. भावनात्मक रूप से इस कविता से जुड़ा हुआ था, इसलिए अब तक पोस्ट नहीं की थी. वो भावनाएं अब प्रायः महत्त्व नहीं रखतीं, और यह कविता अब सिर्फ एक रचना है. इसे मैंने लिखा है, इसके अलावा  अब इसमें मेरा निजी कुछ भी शेष नहीं है.

आओ बैठो
आओ बैठो
कि मिलकर टहलेंगे
शेक्सपियर की दुनिया में
मेरी गोद में सर रखे तुम
डूब जाओ
जूलियट की जुल्फों की खुशबू के
मदहोश नशे में
पीछे एरिक क्लैप्टन गाता रहे
‘डार्लिंग यु आर वंडरफुल टुनाइट’
पृष्ठभूमि में
मंद मंद

या फिर
उड़ चलें हम
हवा के घोड़े पर होकर सवार
कहीं अनंत आसमान की सैर करने
आगे आगे चलती तुम
और पीछे बैठा मैं
चख लिया करूँ, बात बात पर
उस सुराही में से
जिसे तुम अपनी गरदन कहती हो

या फिर कभी
यूं ही समा जाओ बाँहों में
और यह नरम अहसास
मेरा है
यह महसूस करते हुए,
सीने में से पिघल कर बहती हुई
कब की एक भयानक हूक
में तुम्हे नहलाते हुए
फुसफुसा कर तुम्हारे कान में कह दूँ
कि कितना इंतज़ार किया है
हर एक इस पल का मैंने…

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हैदराबाद

वक़्त की कमी कहें, लैपटॉप का न होना, माहौल का बदलना, या फिर मेरी काहिली – पर एक-डेढ़ साल में पहली बार ऐसा हुआ कि तीन महीनों तक कोई भी कविता न निकली. स्थिति यहाँ तक आ गयी थी कि मेरे अन्दर का जो थोड़ा बहुत कुछ कवि था, वो मरने वाला है, ऐसा लगने लगा था. 

ग़ज़ल लिखने का ये मेरा विनम्र प्रयास है. हैदराबाद शहर की फिजा, और ग़ज़ल लिखने का हुनर, शायद दोनों के बारे में ही मैं कुछ नहीं जानता. लेकिन फिर भी इसे यहाँ पेश कर रहा हूँ, क्योंकि कारपोरेट दुनिया कवि को अभी तक तो नहीं मार पायी है, ऐसा संबल देने का अहसान तो इस ग़ज़ल का मुझ पर है ही.

हैदराबाद

वक़्त की मार कर देती है निजामों को भिखमंगा,
ये गन्दा नाला भी कभी मूसी कहलाता था.

रईस बड़े बनते हो, लम्बी कार खरीदकर
निज़ाम जैकब हीरे से मन बहलाता था.

शहर की फिजा बदल दी, ए सी के झोंकों ने
कभी यहाँ आदमी, आदमी को सहलाता था.

अजान पर हाथ जोड़ता पंडित
मौलवी शिवलिंग को नहलाता था.

शान – ए – निजाम कहलाता था
नग़मा – ए – दक़्न कहलाता था
जिसे आज पुराना कहते हो, कभी हैदराबाद कहलाता था.

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The journey

Sitting inside,
peering out of the windows of,
dangling from the doors of,
or traveling atop
the luxury bus

its air, conditioned
from all dust, smoke and soot,

and in august, pure company
of a hundred beautiful people

we looked down
upon those
running helter skelter
unprotected, alone
on the road outside.

Only to become one of them
after a four year long
unforgettable journey.

Categories: IIIT, Poems | 8 Comments

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