इन अश्रुओं को बह जाने दो

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बड़े दिनों से सोच रहा था हिन्दी में कुछ लिखने की। आज संस्थान में लोग मुझे अच्छे अंग्रेज़ी-लेखन के लिए जानते हैं, परन्तु छुटपन में हिन्दी कविताएं लिख-सुना कर बहुत वाहवाही लूट चुका हूं।

दसवीं तक जो कुछ फुटकर-कवित्त लिखा, वह शायद पैंतीस-चालीस डायरी के पन्नों में सिमटा हुआ, अजमेर के मेरे घर की किसी अल्मारी में धूल खा रहा होगा। कवितायें लिख-लिख कर उन्हें बाल-पत्रिकाओं में भेजना अच्छा-ख़ासा शगल रह चुका है। याद पड़ता है, एक कविता ‘बालहंस’ ने छापी भी थी। तीन महीने बाद सौ रुपये पारिश्रमिक भी आया था। किशोरावस्था के जाने के साथ साथ भावनाओं का ज्वार कम होता गया, और कविता-लेखन, प्रायः छूट गया।

यह कविता ग्यारहवीं में लिखी थी मैंने। मेरे जैसे तुच्छ-जीव ऐसी रचनायें जीवन-काल में एक बार से अधिक नहीं कर सकते, अतः ऐसी कोई कविता इन पेजेस पर दुबारा आयेगी, ऐसी उम्मीद न रखें।

आशा करता हूं यह कविता आपको पसन्द आयेगी।

इन अश्रुओं को बह जाने दो

इन अश्रुओं को बह जाने दो।
माना तुम बेहद ग्यानी हो,
निज नरता के अभिमानी हो,
ह्रिदय में गांठ कसी है जो
उसे खुल पाने दो।
इन अश्कों को बह जाने दो।

पराजय ने तुम्हें घेरा है।
दुःख, तनाव, अवसाद का
मन-मस्तिष्क में डेरा है।
आत्म-पुष्प कुम्हलाया है,
आत्म पर विश्वास डोला है।
तब ह्रिदय द्वार खुल जाने दो।
इन अश्रुओं को बह जाने दो।

आंसुओं को धिक्कारा जाता है।
कोई कायरता चिह्न बताता है।
आंखें छ्लछला आती हैं,
गला भर्रा जाता है,
किन्तु नर लोक-लाज से अश्रु
नयनों से निकाल न पाता है।

ये नन्हें-नन्हें नयनों के मोती
ह्रिदय हल्का कर जाते हैं,
चित्त शांत, मन स्थिर,
उम्मीद की किरण दिखा जाते हैं।
इनसे तुम्हार बैर क्या?
स्वयं को स्वयं से न लजाने दो,
इन अश्रुओं को बरबस बह जाने दो॥

Categories: Poems | 16 Comments

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16 thoughts on “इन अश्रुओं को बह जाने दो

  1. Pratyush

    nice poem….
    gud work..keep writing..

  2. Meeshu

    बहुत ही सुंदर मेरे दोस्त ……
    शब्दों का चयन तारीफ-ए-काबिल है ।
    ये बात तो एकदम सही है प्यारे ! वो दिन ही कुछ और थे…
    समय के साथ साथ जोश कुछ ठंडा पड़ जाता है, पर ये आदत छुटती नहीं
    बढिया है… हमें भी एक साथी मिल गया ।
    – मीशु

  3. Meeshu

    एक दोस्त को खोने का दर्द

    02-01-2005……

    जीवन है चुनौितयों का सफर,
    बस ईश्वर ही तेरा हमसफर ।
    कौन यहॉं अपना हुआ है,
    समय की भूलभूलैया में हरेक खोया हुआ है।
    कल को िजसे हम अपना यार कहते थे,
    िजनके साथ हर खुशी हर गम बॉटते थे ।
    आज वही हमसे दूर भाग रहे हैं,
    कारण समय की मॉंग बता रहे है ।
    हर बार हमारी ये आँखे छलकती है,
    लेिकन क्या करे
    जीवन की गाड़ी िबना हमसफर कहॉ चलती है ।
    पर हमने भी ये सोच िलया है ,
    मन में यह ठान िलया है ।
    भले ही यह वक्त हमसे दोस्तों को छीनता रहे,
    पर हम भी इस दुिनया को अपना साथी बनाने में पीछे ना रहे ।

    मीशु

  4. wow! you reminded me of my school days. That book named स्वाित with around 30 poems for CBSE boards.. damn!

    nice work!

  5. Nice work dude…hope to see more..

  6. just to tell you that I DID try to read the poem, but my hindi sux…
    still I did try😀

  7. बहुत ही सुंदर रचना है । ऐसे ही लिखते रहो। वैसे ग्यारहवीं में ऐसी कविता सचमुच ही काबिले तारीफ़ है ।

  8. I just happened to read Ojasvi’s first poem few days back… and now it was ur turn… I think I should forward it to my mom…she being a Hindi Professor can judge it well… but there is one thing I would like to share….that is it’s been a long while since I read the last hindi poem…. and I felt really ashamed that I am an Indian… but as far as the poem is concerned… maine in ashkon ko behne diya hai…….. keep writing…….

  9. @ प्रत्युष, राकॆश, पीयुष, पन्कज : धन्यवाद्! अच्छा ल‌गा आप‌की राय‌ जान‌ क‌र‌.

    @ मॊहित : तुम्हारी कविता भी कुछ कम नही. जानकर खुशी हुई कि मॆरॆ जैसॆ कुछ और् लॊग भी यहा है.

    @ गौरव : हिन्दी भी पढा करॊ दॊस्त…

    @ हिमान्शु : मॆरी कविता और स्वाति ? धन्यभाग मॆरॆ !

    आप स‌भी कॊ हार्दिक ध‌न्य‌वाद. नई पॊस्ट्स पर आपकॆ विचारॊ की प्रतीक्षा मॆ.

    अनिकॆत.

  10. अनुनाद सिंह

    अनिकेत भाई,

    आपकी रचना बहुत पसन्द आई। हिन्दी के ब्लागर भी आजकल खूब लिख रहे हैं, कविता और बहुत कुछ और भी। कभी यहाँ भी पधारें:

  11. अनुनाद सिंह

    अनिकेत भाई,

    आपकी रचना बहुत पसन्द आई। हिन्दी के ब्लागर भी आजकल खूब लिख रहे हैं, कविता और बहुत कुछ और भी। कभी यहाँ भी पधारें:

    http://narad.akshargram.com/

  12. Atul

    मेरे भाई आपकी रचना मेरे मन को मुग्घ कर डिया है.
    आपकी रचना की इस paragraph ने मेरे मन को प्रभावित् किय .

    “पराजय ने तुम्हें घेरा है।
    दुख, तनाव अवसाद का
    मन मस्तिष्क में डेरा है।
    आत्म्-पुष्प कुम्हलाया है,
    आत्म पर विश्वास डोला है।
    तब ह्रिदय-द्वार खुल जाने दो,”

    Good Bond bhai …!! keep writing don’t stop ….

  13. आपकी कविता पढीी तोो एक अनोखे ददॆ व वेदना की अनुभूति हुई ा अपने दिल कि भावनावों को कविता के माध्यम से आपने बड़े हि मामिॆक रूप से चित्रित किया है ा

  14. Nice poem yaar…second last line hav lots of meaning in it…keep it up !!!

  15. A good poem with inner meanings…. keep writing!!

  16. Richa Arora

    Very Beautiful…
    Keep writting🙂 god bless u

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